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कोरोना काल में सेवा करते हुए कलीसिया ने कई सदस्यों को खोया।
भारतीय काथलिक समुदाय ने कोविड मरीजों, संक्रमित लोगों, हाशिये पर जीवनयापन करनेवालों एवं कमजोर लोगों की सेवा में अथक काम करते हुए बड़ी कीमत चुकायी है। 29 मई तक कोविड-19 से मरने वाले पुरोहितों की संख्या 204 और धर्मबहनों की संख्या 210 थी जो हर दिन बढ़ती ही जा रही है।
उनके साथ, तीन धर्माध्यक्षों और हजारों प्रचारकों, लोकधर्मी महिलाओं, पुरूषों एवं युवाओं की मृत्यु हुई है, जिन्होंने उदारता की शुद्ध ख्रीस्तीय भावना से प्रेरित होकर पीड़ित लोगों के करीब रहते हुए अपना जीवन गवाँ दिया। कई लोग वायरस से संक्रमित हो गये जो उनके लिए जानलेवा साबित हुआ, खासकर जब वे प्रेरितिक, सामाजिक और परोपकार के कार्य कर रहे थे तथा मानवीय एवं आध्यात्मिक चेतना के साथ पीड़ित लोगों को शारीरिक एवं आध्यात्मिक सामीप्य प्रदान किया। साथ ही मरीजों की देखभाल में पहली पंक्ति पर कार्य कर रहे डॉक्टरों और नर्सों को साथ दिया।
इस मामले में गौर करनेवाली बात है कि भारत में काथलिक अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र के नेटवर्क व्यापक और उपकरणों से सुसज्जित हैं, जो खासकर, अपनी सेवा ग्रामीण क्षेत्रों में देते हैं। इन केंद्रों में स्वास्थ्य कर्मी, धर्मसमाजी, काथलिक स्वयंसेवक ने कोविड-19 से संक्रमित होने के खतरे के बावजूद अपने कार्यों को सच्चे सुसमाचारी मिशन के रूप में जारी रखा।
"इंडियन कर्रेंट्स" पत्रिका के संपादक कपुचिन फादर सुरेश मैथ्यू ने कहा, "मैं भारत की कलीसिया के लिए इतने बड़े घाटे को देखकर हैरान हूँ।" फादर मैथ्यू जिन्होंने प्रेरिताई कार्य करते हुए जान गवाँने वाले पुरोहितों एवं धर्मबहनों की सूची को अपडेट किया है लोस्सेरवातोरे रोमानो को बतलाया, "देश में करीब 20,000 काथलिक पुरोहित हैं जिसमें धर्मप्रांतीय एवं धर्मसमाजी दोनों शामिल हैं। दूसरी ओर, धर्मबहनों की संख्या करीब 1,03,000 है।" मौत के शिकार पुरोहित एवं धर्मबहनें विभिन्न धर्मसमाजों के सदस्य थे। उनमें से कई 50 से कम उम्र के थे।
जेस्विट सोसाईटी से 36 पुरोहितों और मिशनरीस ऑफ चैरिटी की 14 धर्मबहनों की मौत हुई है। मदर तेरेसा की धर्मबहनें उन धर्मसमाजियों में से हैं जो अपने केंद्रों में सबसे निम्न, परित्यक्त और मरनासन्न में पड़े लोगों के करीब रहते हैं, निश्चय ही, उनके द्वारा ख्रीस्त लोगों के लिए प्रस्तुत होते हैं। संस्थापक संत इग्नासियुस के पदचिन्हों पर चलने वाले भारत के जेस्विट्स भी गरीब, आदिवासी और दलित लोगों की मानवीय सहायता करने के लिए पहचाने जाते हैं। कई पुरोहितों ने संस्कारों का अनुष्ठान करना जारी रखा ताकि विश्वासियों को आध्यात्मिक रूप से वंचित होना न पड़े। वहीं कुछ पुरोहित गाँववालों की मदद करते रहे, जहाँ अस्पताल की सुविधा नहीं है क्योंकि अस्पतालों की पर्याप्त सुविधा बड़े शहरों में ही पाये जाती हैं।
फादर सुरेश ने कहा "इस त्रासदीपूर्ण घाटे को विश्वास से देखते हुए हम कह सकते हैं कि वे अब स्वर्ग में हूँ। उन्होंने अपने आपको अर्पित किया, कई गरीब लोगों के लिए वे भले चरवाहे की छवि हैं जो अपनी भेड़ों से प्रेम करते एवं उनकी देखभाल करते हैं।"
अंत में उन्होंने कहा : "हमारा जीवन ईश्वर का दान है। पड़ोसियों, जरूरतमंद लोगों एवं पीड़ितों को मुफ्त सेवा देकर हम इसे उन्हीं को वापस लौटाते हैं।"
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