सच्ची स्वतंत्रता का उद्भव प्रेम है। 

पोप फ्रांसिस ने गलातियों के नाम संत पौलुस के पत्र पर अपनी धर्मशिक्षा माला जारी रखते हुए सच्ची स्वतंत्रता को प्रेम से उत्प्रेरित बतलाता।
पोप फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन के संत पापा पौल षष्टम के सभागार में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।
प्रेरित संत पौलुस गलातियों के नाम अपने पत्र में विश्वास की नवीनता के बारे में कहते हैं। यह सचमुच एक बहुत बड़ी नवीनता है क्योंकि यह न केवल जीवन के कुछेक बातों की नवीनता का जिक्र करता है अपितु यह हममें वह “नया जीवन” लाता है जिसे हमने बपतिस्मा संस्कार में प्राप्त किया है। यहाँ हम अपने लिए उस महानतम उपहार को प्राप्त करते हैं जो हमें ईश्वर की संतान बनाता है। ख्रीस्त में हमारा नया जन्म हमें संहिता की धार्मिकता से उस सजीव विश्वास में बढ़ने को मदद करता है जिसका केन्द्र-विन्दु ईश्वर हैं जिसके फलस्वरुप हम अपने को अपने भाई-बहनों से संयुक्त करते हैं। इस भांति हम भय की गुलामी और पाप से स्वतंत्र होकर ईश्वर की संतान बनते हैं।
आज हम इस बात को समझने की कोशिश करेंगे कि प्रेरित के हृदय में इस स्वतंत्रता का अर्थ क्या है। संत पौलुस कहते हैं कि यह “शरीर के लिए एक अवसर” के अलावा और कुछ नहीं है, अर्थात यह शारीरिक रुप में या भावनाओं और अपने स्वार्थपूर्ण इच्छाओं के अनुरूप जीवन जीना नहीं है बल्कि इसके विपरीत येसु ख्रीस्त में मिली स्वतंत्रता जैसे कि संत पौलुस लिखते हैं,“दूसरों की सेवा हेतु जीवन जीना है”। संत पापा ने कहा कि लेकिन यह तो एक गुलामी है, येसु ख्रीस्त में स्वतंत्रता के आयाम में हम गुलामी को पाते जो हमें दूसरों की सेवा करने का आह्वान करती है। सच्ची स्वतंत्रता दूसरे शब्दों में यदि हम कहें तो अपने को करूणा में व्यक्त करती है। यहाँ हम पुनः सुसमाचार के विरोधाभास को पाते हैं। हम अपनी सेवा में अपनी पूर्ण स्वतंत्रता को पाते हैं, स्वतंत्रता का यह अर्थ नहीं की हम जो चाहें करें। हमारी स्वतंत्रता का मापदण्ड अपने को पूर्णरूपेण दूसरों को देने में है। हम साहस में अपने को दूसरों के लिए देखते हुए जीवन प्राप्त करते हैं (मर.8.35), यही सही सुसमाचार है।
पोप फ्रांसिस ने कहा कि हम इस विरोधाभाव का उल्लेख कैसे कर सकते हैंॽ यह क्यों विरोधाभाव है। “भ्रातृत्व प्रेम” से संबंधित प्रेरित का उत्तर उतना ही सहज है जितना की यह चुनौतीपूर्ण है। प्रेम के अभाव में हम स्वतंत्रता नहीं होते हैं। अपने स्वार्थ में जो हमें अच्छा लगता उसे करते जाना स्वतंत्रता नहीं है क्योंकि यह अपने में क्रेन्दित है, जो फलहित नहीं होता है। यह ईश्वर का प्रेम है जहाँ हम अपने को स्वतंत्र पाते हैं और यह पुनः वह प्रेम है जो हमें बदत्तर गुलामी से मुक्त करता है जहाँ हम स्वयं तक ही सीमित नहीं रहते हैं, अतः स्वतंत्रता का विकास प्रेम में होता है। लेकिन हम सावधान रहें, यह धारावाहिक अंतरंग प्रेम नहीं जहाँ हम अपनी भावनाओं को किसी भी रुप में पूरा करने की चाह रखते हैं, यह वह प्रेम नहीं है, बल्कि यह येसु ख्रीस्त का वह करूणामय प्रेम है जो हमें सच्चे अर्थ में स्वतंत्र और मुक्त करता है। यह वह प्रेम है जो शर्तहीन सेवा में प्रदीप्त होता है जो येसु में अपनी चरमसीमा को प्राप्त करता, जो अपने चेलों के पैर धोते हुए कहते हैं, “मैंने तुम्हें एक उदाहरण दिया है जिसे तुम वैसा ही करो जैसे मैंने तुम्हारे साथ किया है” (यो.13.15)।
पोप फ्रांसिस ने कहा कि संत पौलुस के लिए, इस भांति स्वतंत्रता उन सारी चीजों को करना नहीं जिसे वे चाहते और पसंद करते हैं। इस तरह की स्वतंत्रता उद्देश्यहीन और बिना किसी संदर्भ के होती है जो अपने में एक व्यर्थ स्वतंत्रता है। वास्तव में, ऐसी स्वतंत्रता हमें आंतरिक रुप में खालीपन का एहसास दिलाती है। कितनी बार, केवल अपनी सहज-बुद्धि का अनुसारण करने के कारण हम आंतरिक रुप में एक बृहृद खालीपन का अनुभव करते हैं और साथ ही हम यह एहसास करते कि हमने अपनी स्वतंत्रता रूपी निधि का दुरूपयोग किया है। वहीं दूसरों के लिए अच्छाई का सच्चा चुनाव करना हमें अपनी पूर्ण, सच्ची स्वतंत्रता का एहसास दिलाता है। केवल यही स्वतंत्रता हमारे लिए पूर्ण और ठोस है जो हमारे रोज दिन के जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है।
कुरूथियों के नाम अपने पहले पत्र में संत पौलुस उन लोगों को अपना उत्तर देते जो झूठी स्वतंत्रता का प्रचार करते हैं। “सभी चीजें वैध हैं”, जिन्हें आप कर सकते हैं, नहीं, यह एक भ्रामित विचार है। संत पौलुस कहते हैं कि सभी चीजें वैध हैं लेकन सारी चीजें लाभदायक नहीं हैं। वे पुनः कहते हैं, “सब कोई अपना नहीं, बल्कि दूसरों के हित का ध्यान रखें” (1.कुरि.10.23-24)। यह किसी भी स्वार्थपूर्ण स्वतंत्रता का पर्दाफाश करने हेतु नियम है। वे जिन्होंने स्वतंत्रता का उपयोग अपनी ही सुखद इच्छाओं की प्राप्ति हेतु की उनके लिए संत पौलुस ने प्रेम की आवश्यकता पर बल दिया। केवल प्रेम से उत्प्रेरित स्वतंत्रता ही हमें और दूसरों को स्वतंत्र करती है। यह दूसरों पर दबाव डाले बिना उनकी बातों को सुनना है, यह दूसरों का दूरूपयोग किये बिना उन्हें प्रेम करना है, यह निर्माण करना है न कि विनाश करना, यह अपनी सुविधा के लिए दूसरों का शोषण नहीं करता और यह अपनी लाभ की चाह किये बिना दूसरों की भलाई खोजना है। संक्षेप में, यदि स्वतंत्रता भलाई हेतु नहीं होती तो यह अपने में बंजर हो जाती और कोई फल उत्पन्न नहीं करती है। वहीं दूसरी ओर, प्रेम से प्रेरित स्वतंत्रता गरीबों की ओर अग्रसर होती है, उनमें ख्रीस्त के चेहरे को पहचानती है। 

Add new comment

6 + 2 =