प्रेरित

पहले पाठ में सिनाई और सियोन पर्वत के बीच विरोधाभास पाते हैं। पुराने विधान में इस्राएली जाति सिनाई पर्वत पर विस्मय और डर से काँपती है यहाँ तक कि मूसा भी डर से काँपता है। ये ईश्वर के प्रति आदर, और मान- सम्मान की भावना थी। मगर अब लोग ईसा के रक्त की बदौलत ईश्वर के नगर स्वर्गिक येरुसालेम के पास पहुँचेंगे जो मसीही जीवन की परिपूर्णता है।
एक प्रेरित, ईश्वर के राज्य में एक संदेशवाहक है और उनका कार्य है सिर्फ उन्हीं की बातों को बतलाना जिसने उन्हें भेजा है। अपने स्वभाव, चतुराई, बुद्धिमता के लिए सम्मानित नहीं किए जाते हैं। जो कार्य मिलता है वही उनका मिशन है। भेजे गए के हाथ में एक औजार है। यही उनका कार्य, शक्ति, इज्जत, मान- सम्मान और महानता है। उनका कार्य है अपने विशेष कार्य और भेजे गए के प्रति विश्वस्त होना। प्रेरितों का कार्य इस प्रकार था-
1. ईसा का संदेश शिष्यों ने अपने किसी संदेश को नहीं दिया लेकिन सिर्फ ईसा का संदेश था।
2. राजा का संदेश - वह था “पश्चात्ताप"। इसका अर्थ है अपने मन और हदय का परिवर्तन तथा कार्यों में भी बदलाहट। 
3. राजा की दया - चंगाई, गरीबों को स्वतंत्र, अशुद्ध आत्माओं को निकालना इत्यादि। कलीसिया के शुरू से ही शरीर के साथ आत्मा की चंगाई की जाती है।
आज हम सभी मिलकर संत योहन दे ब्रिटो, येसु समाजी और शहीद का पर्व मनाते हैं। संत फ्रांसिस जेवियर को, उन्हें काफी पहले से समर्पित कर दिया गया कि उनकी मध्यस्थता द्वारा प्रार्थना करने से चंगाई मिली थी। येसु समाजी के शुरुआती जीवन से ही संत फ्रांसिस जेवियर की तरह भारत में एक मिशनरी बनना चाहा तथा तंजौर और मरवा क्षेत्र में कार्य किया। अनन्तः ओरियूर में अपनी शहादत के द्वारा ख्रीस्त का साक्ष्य दिया।

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