पश्चाताप

पश्चात्ताप का अर्थ होता है, परिवर्तन या बदलाहट। यह मन और हृदय की पूर्ण नवीनीकरण पर आधारित है। आज के पहले पाठ में नबी योना निनवे निवासियों के लिए पश्चाताप और परिवर्तन का संदेश देते हैं। निनिवे के लोग गैर यहूदी और बहुत खुंखार थे फिर भी योना की शिक्षा पर विश्वास किया। ईश्वर की आज्ञानुसार निनिवे के लोगों को योना उपदेश देते हैं और लोग उनकी सुनते हैं। सभी लोग राजा, रंक, गरीब- धनी, जानवर सभी पश्चात्ताप करते हुए ईश्वर की गुहार लगाते हैं। ईश्वर की दया और क्षमा मिलती है और उनपर जो विपत्ति आनी थी, वह टाल दी जाती है। चालीसे काल में हमें ईश्वर की ओर फिरने के लिए कलीसिया आह्वान करती है। हम भी अपने पापों के लिए ईश्वर, पड़ोसियों तथा अपने आप से क्षमा माँगें।
चिह्न हमारी पहचान है, हमारा अस्तित्व है। येसु ने लोगों के बीच अपने को प्रकट किया है। योना नबी निनिवे के लिए एक चिह्न था। येसु भी कहते हैं कि यही चिह्न केवल लोगों को दिया जायेगा। योना तीन दिन तीन रात मछली के पेट में रहा। वही चिह्न येसु के दुःखभोग, मरण और जी उठने की ओर संकेत है। येसु सुलेमान और योना से भी महान् हैं पर लोग उनकी ओर नहीं देखते हैं। ईसा उनके जीवन में आना चाहते हैं पर वे अपने दिल के दरवाजे को बंद कर देते हैं। दक्षिण की सनी और निनिवे के लोग इस पीढ़ी के लोगों को दोषी ठहराएँगे क्योंकि उन्होंने ख्रीस्त को देखा, पर नहीं पहचाना। येसु आज अलग- अलग घटनाओं के द्वारा हमें चिह्न देते हैं।

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