तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?

पेत्रुस छोटे झुण्ड के चरवाहे हैं तथा उनके प्रति जो जिम्मेवारी है उसे दूसरों के साथ साझा करते हैं। वे कहते हैं "अर्थभाव" के लिए नहीं, पर “सेवाभाव" द्वारा आगे बढ़ें। दुनिया के समान नहीं लेकिन विनम्रतापूर्वक। दुनिया की सोच के विपरीत चलना है संयम को ढाल बनाकर। सबका साथ सबका विकास समझते और समझाते हुए आगे ले चलना है। लाचारीवश नहीं लेकिन उदारता और खुशीपूर्वक, तब अंततः हमारे गले में विजय की माला पहनाई जायेगी।
जिसे हमने सुना है और जिसका हमने अनुभव स्वयं किया है उसमें आकाश- पाताल का अन्तर है। ईसा एक अहम और निर्णायक सवाल अपने शिष्यों से पूछते हैं। यह चुनौती भरा है। "तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?" प्रश्न यह है कि क्या हम उसे जानते और स्वीकाते हैं? जब हम यह स्वीकार करते हैं कि वे जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं तो हमें विश्वास करना और आज्ञाओं का पालन करना है। उन्होंने अपने शिष्यों को अपनी शिक्षा, चंगाई के चमत्कार, दो मर्तबा रोटियों के चमत्कार, समुद्र की लहरों से प्रश्न का जवाब दिया है। पेत्रुस तुरन्त कहते हैं - "आप मसीह हैं आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं।" ईसा जानते थे कि ये ही वे लोग हैं जो उनके बाद दुनिया की अलग- अलग दिशाओं में जाकर सुसमाचार का प्रचार करेंगे, अतः अपने विश्वास में खरा उतरना और व्यक्तिगत रूप से ईसा का अनुभव करना बहुत जरूरी था। हमें भी येसु यही प्रश्न आज करते हैं। हमारा जवाब क्या होगा? क्या हम पेत्रुस की भाँति कह सकेंगे कि आप मसीह हैं आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं?

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