उत्तम फल

आज के सुसमाचार में दाखबारी के हिंसक असामियों का दृष्टान्त सुने। इस दृष्टान्त में सीधे यहूदी नेताओं पर प्रहार किया गया है, जिनके बारे में नबी इसायाह ने दाखबारी के गीत में लिखा है, जिसे हम आज के पहले पाठ में सुने। इस्राएल ईश्वर की दाखबारी है, जो केवल जंगली अंगूर देती है। पहले पाठ में ईश्वर के उदार प्रेम, परवाह, रक्षा के बारे में कहा गया है, जिसे इस्राएल ठुकरा कर पाप, लोभ, हठी, घमण्ड, अन्याय, अत्याचार, शोषण, विश्वासघात का जीवन जीने लगे। ईश्वर ने उससे न्याय और धार्मिकता की आशा की थी, परन्तु उसने सिर्फ अन्याय और हिंसा का मार्ग अपनाया। इस आचरण पर की आज सुसमाचार का पाठ प्रकाश डालता है। इस्राएल के धार्मिक नेताओं को असामियों के सदृश बताया गया है, जिनको लोगों की देखभाल करने की जिम्मेदारी दी गयी थी और उनसे अच्छे फल प्राप्त करने की आशा थी। स्वामी के द्वारा भेजे गये सेवक पुराने विधान में नबी हैं, जिन पर अत्याचार किया गया और जिन्हें मार डाला गया (2 इति . 24 : 19-21; नहे 9: 26-30; यिर. 20: 2 : 26 : 21-23)। अन्त में वे अपने ही पुत्र को भेजते हैं, लेकिन हिंसक असामियों ने उसे पकड़कर मार डाला। स्वामी का पुत्र ईसा है जिसे यहूदी नेताओं ने पकड़ कर मार डाला। प्रभु येसु कहते हैं कि जैसे कारीगरों ने जिस पत्थर को बेकार समझकर निकाल दिया था। वही कोने का पत्थर बन गया है (स्तोत्र 118 : 22-23), क्योंकि प्रभु येसु मृत्यु के बाद तीसरे दिन जी उठे हैं। अभी भी जीवित और सक्रिय हैं (इब्र 4:12)| नयी प्रजा के लोग हम हैं, जो प्रभु येसु मसीह पर विश्वास रखते हुए अच्छे फलों को उत्पन्न करेंगे। इसलिए संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में कहते हैं, जो हमारे लिए आज भी सार्थक है: “जो कुछ सच है, आदरणीय है; जो कुछ न्यायसंगत है, निर्दोष है; जो कुछ प्रीतिकर है, मनोहर है; जो कुछ उत्तम है, प्रशंसनीय है, ऐसी बातों का मनन किया करें। मेरे जैसे आचरण भी करें। प्रार्थना करें। इस प्रकार उत्तम फल उत्पन्न करेंगे।"

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